एक स्त्री का संसार घर से शुरू होता है लेकिन उसका अस्तित्व घर तक सीमित नहीं होता।
जब किसी परिवार में बेटी का जनम होता है, तो उसके साथ केवल नया जीवन ही नहीं आता, बल्कि अनगिनत उम्मीदें , परंपराए, संस्कार और सपने भी जन्म लेते हैं।
जन्म के पहले दिन ही समाज और रिश्तेदार उसके लिए कुछ भूमिकाएं तय कर देते है और उसके पूरे जीवनकाल में एक प्रश्न अक्सर अनसुना रह जाता है क्या वो स्वयं कुछ बोलना, करना चाहती है ?
किसी भी इंसान के लिए उसका घर उसकी पहली पाठशाला होता है । यह वो स्थान है जहां एक व्यक्ति के व्यक्तिव की नींव रखी जाती है। जहां वो बोलना, चलना, रिश्ते, संस्कार सब कुछ प्राप्त करती हैं।
बेटी जब छोटी होती हैं तब हम उसे सारे संस्कार देते है और बोलते है, यही संस्कार जब वो बड़े होकर ससुराल जाएगी तब हमें गर्व महसूस कराएंगे। जब उसे शिक्षा दी जाती है तो कहा जाता है कि एक अच्छा घर परिवार मिल जाएगा और ये शिक्षा अपने बच्चों को पढ़ाने काम आएगी। ऐसा क्यों?
आज भी हमारे आसपास में कई ऐसे घर हैं जहां बेटी को master या PhD तक सब कुछ पढ़ाया जाता है और बोला जाता है कि अब तुम जॉब या कुछ वर्क नहीं करोगी सिर्फ घर और बच्चे संभालोगी। तो मेरे मन में ये सवाल उठता है कि जब घर पे ही बिठाना था तो पढ़ाया क्यों? अगर सब कुछ करके घर पे ही रहना है तो उसका क्या फायदा.?
तो जवाब आता है कि अच्छा ससुराल, घर, पति मिले।
पर ससुराल अच्छा हो या बुरा वहां कौनसे लोग उसकी पढ़ाई या डिग्री पूछते हैं? वहां तो सवाल आता है घर के काम आते है, रीतिरिवाज आते हैं, रसोई आती हैं? और औरत होने के नाते मेरा अनुभव है कि ससुराल में कोई डिग्री या पढ़ाई क्या की नहीं पूछता, वहां ये कोई मान्य नहीं है कि तुम क्या पढ़ी और क्या तुम्हारे सपने है?
आज का पढ़ा लिखा समाज या इंसान ये बात समझ सकता है पर पुरानी पीढ़ी के शायद ही कुछ लोग ये बात समझ सकते है।
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